Additional information
| Weight | 0.325 kg |
|---|---|
| Dimensions | 22 × 14 × 2.0 cm |
| ISBN | 978-81-977395-8-3 |
| AUTHOR | SURENDRA CHANDRAVANSHI 'SACHET' |
| PAGES | 256 |
Original price was: ₹349.00.₹225.00Current price is: ₹225.00.
हिंदी के आंचलिक उपन्यास केवल किसी क्षेत्र विशेष का चित्रण भर नहीं होते, वे उस मिट्टी की गंध, लोक जीवन की धड़कन और बोलियों की जीवंत लय को शब्दों में सहेजते हैं। इन रचनाओं में गाँव केवल पृष्ठभूमि भर नहीं, बल्कि एक सजीव पात्र बनकर उपस्थित रहता है, जहाँ परंपराएँ, संबंधों की जटिलता, सामाजिक मानदंड और समय के साथ बदलती मान्यताएँ एक-दूसरे में गुंथी दिखाई देती हैं। ‘दिलबसिया’ इसी समृद्ध आंचलिक परंपरा की मार्मिक और प्रभावशाली कड़ी है। झारखंड की धरती से आने वाले कवि/लेखक सुरेंद्र चंद्रवंशी द्वारा रचित यह उपन्यास झारखंड की ग्रामीण धरती से उपजता है और एक स्त्री की जीवन यात्रा के माध्यम से कई पीढ़ियों की कहानी कहता है।
आंचलिक भाषा का सहज और स्वाभाविक प्रयोग कथा को ऐसी प्रामाणिकता देता है कि पाठक स्वयं खेतों की मेड़ों, कच्ची पगडंडियों और आँगन की चौखटों के बीच चलने लगता है। यह केवल व्यक्तिगत संघर्ष की कथा नहीं है, बल्कि सामाजिक दबावों, पारिवारिक अपेक्षाओं, मान-सम्मान की अवधारणाओं और स्त्री जीवन की जिजीविषा का दस्तावेज़ है। ‘दिलबसिया’ एक ऐसी नायिका की कहानी है, जो परिस्थितियों से टूटती नहीं, बल्कि हर मोड़ पर अपने भीतर की आग से नया रूप गढ़ती है। करुणा, स्वाभिमान, साहस और मानवीय गरिमा से बुनी यह रचना पाठक को भीतर तक छू जाती है और देर तक मन में गूँजती रहती है, मानो मिट्टी की कोई सोंधी ख़ुशबू हो, जो समय बीत जाने पर भी साथ बनी रह जाती है।
| Weight | 0.325 kg |
|---|---|
| Dimensions | 22 × 14 × 2.0 cm |
| ISBN | 978-81-977395-8-3 |
| AUTHOR | SURENDRA CHANDRAVANSHI 'SACHET' |
| PAGES | 256 |
हिंदी के आंचलिक उपन्यास केवल किसी क्षेत्र विशेष का चित्रण भर नहीं होते, वे उस मिट्टी की गंध, लोक जीवन की धड़कन और बोलियों की जीवंत लय को शब्दों में सहेजते हैं। इन रचनाओं में गाँव केवल पृष्ठभूमि भर नहीं, बल्कि एक सजीव पात्र बनकर उपस्थित रहता है, जहाँ परंपराएँ, संबंधों की जटिलता, सामाजिक मानदंड और समय के साथ बदलती मान्यताएँ एक-दूसरे में गुंथी दिखाई देती हैं। ‘दिलबसिया’ इसी समृद्ध आंचलिक परंपरा की मार्मिक और प्रभावशाली कड़ी है। झारखंड की धरती से आने वाले कवि/लेखक सुरेंद्र चंद्रवंशी द्वारा रचित यह उपन्यास झारखंड की ग्रामीण धरती से उपजता है और एक स्त्री की जीवन यात्रा के माध्यम से कई पीढ़ियों की कहानी कहता है।
आंचलिक भाषा का सहज और स्वाभाविक प्रयोग कथा को ऐसी प्रामाणिकता देता है कि पाठक स्वयं खेतों की मेड़ों, कच्ची पगडंडियों और आँगन की चौखटों के बीच चलने लगता है। यह केवल व्यक्तिगत संघर्ष की कथा नहीं है, बल्कि सामाजिक दबावों, पारिवारिक अपेक्षाओं, मान-सम्मान की अवधारणाओं और स्त्री जीवन की जिजीविषा का दस्तावेज़ है। ‘दिलबसिया’ एक ऐसी नायिका की कहानी है, जो परिस्थितियों से टूटती नहीं, बल्कि हर मोड़ पर अपने भीतर की आग से नया रूप गढ़ती है। करुणा, स्वाभिमान, साहस और मानवीय गरिमा से बुनी यह रचना पाठक को भीतर तक छू जाती है और देर तक मन में गूँजती रहती है, मानो मिट्टी की कोई सोंधी ख़ुशबू हो, जो समय बीत जाने पर भी साथ बनी रह जाती है।